Saturday, 31 July 2021

अमर शहीद क्रान्तिकारी उधम सिंह की पुण्य तिथि पर नमन

 मित्रों आज भारत माता के एक ऐसे महान सपूत की पुण्यतिथि है जिसने अंग्रेज़ो से जलियांवाला बाग़ हत्या कांड का बदला लेना अपने जीवन का एक मात्र लक्ष्य बना लिया और इस कांड के रचनाकार अंग्रेज़ अफसर माइकल ओड वायर की हत्या कर भारत वासियों को गौरान्वित किया। भारत माता के ऐसे सिपाही का नाम था उधम सिंह।


आज ही के दिन यानी की 31 जुलाई 1940 को उनको अंग्रेजी हुकूमत ने फाँसी पर चढ़ा दिया। पिछले महीने अपने लंदन प्रवास के दौरान मैंने ये तय कर रखा था की मुझे उधम सिंह से जुड़े दो महत्वपूर्ण स्थानों पर अवश्य जाना है और उस पावन स्थान पर अवश्य नमन करना है। पहला स्थान था कॉक्सटन हॉल जहां उधम सिंह ने जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के मुख्य सूत्रधार माइकल ऑड वायर को गोली मारी थी और दूसरा था पैंटोनविल जेल जहां उधम सिंह को फाँसी पर चढ़ाया गया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर आप भी इन दोनों स्थानों के दर्शन करवा रहा हूँ।

उधम सिंह जी का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले में हुआ पर उनके माता पिता जी का देहांत बचपन में ही हो गया था उनकी परवरिश अमृतसर के पुतलीघर में स्तिथ अनाथ आश्रम में हुई। उनकी शिक्षा दीक्षा भी यहीं हुई।

जलियांवाला कांड के वो प्रत्यक्ष दर्शी बने और इसी वजह से दिन रात उनके दिलो दिमाग पर जलियांवाला बाग ही छाया रहता, उन्होंने प्रण ले लिया था के किसी तरह से डायर की हत्या कर के पंजाब की और हिंदुस्तान की अस्मिता पर लगे दाग को हमेशा के लिए मिटाना है। उन्होंने इसी को अपने जीवन का मकसद बना लिया। उधम सिंह कौमी एकता के बड़े पक्षधर थे इसीलिए उन्होंने अपना नाम राम मोहम्मद सिंह आज़ाद भी रख लिया।

अमेरिका में उनका जाना हुआ तो वो ग़दर पार्टी के संपर्क में आ गए और भगत सिंह के कहने पर वहां से अपने साथ 25 क्रांतिकारियों और बहुत से हथियार ले कर के आए ताकि भारत में चल रही क्रांति को गति प्रदान की जा सके। परन्तु, किसी तरह अंग्रेज़ों को इसकी भनक लग गयी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।





कुछ वर्ष बाद,जेल से छूटने के बाद 1934 में अपना लक्ष्य पूरा करने लन्दन पहुँच गए। वहां अपना मकसद पूरा करने के लिए दिन रात लगे रहते इस काम को अंजाम देने के लिए उन्होंने एक पिस्तौल खरीदी और छह कारतूस भी खरीद लिए और इस काम को अंजाम देने के लिए माकूल समय का इंतज़ार करने लगे अन्त: जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के *काक्सटन हालमें जैसे ही माइकल ओड वायर आया तो उधन सिंह जिन्होंने अपनी पिस्तौल एक मोटी किताब को फाड़ कर उसमे छुपा रखी थी, निकाल कर डायर की छाती में उतार दिया।


इस तरह हजारों बेक़सूर भारतीयों की हत्या का बदला ले लिया, अंग्रेज़ो की धरती पर अंग्रेज़ी अफसर को मार कर उन्होंने सिद्ध कर दिया की हिंदुस्तानीं क्रन्तिकारी के जज़्बे में किसी प्रकार की कमी नहीं है। पूरी अंग्रेज़ सरकार हिल गयी। अंत: उनको 31 जुलाई 1940 को जेल- पेंटोन्विल जेल में ही फाँसी पर टांग दिया गया।

इस शूरवीर की पुण्यतिथि पर ऋणी राष्ट्र की ओर से शत शत नमन।

Tuesday, 30 June 2020

आषाढ़ी एकादशी पर दर्शन पंढरपुर के

आज पवित्र आषाढ़ी एकादशी है, इसे देवशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, मान्यता है कि इस दिन विष्णु भगवान जी चार मास के लिए क्षीर सागर में शयन करते हैं। इस एकादशी का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है।

इस पावन अवसर पर मैं आपको ले कर चल हूँ विष्णु भगवान जी को समर्पित कृष्ण जी का एक मशहूर और दिव्य मंदिर जो की पंढरपुर, ज़िला शोलापुर, महाराष्ट्र में है. भारत वर्ष में विष्णु जी के प्रमुख मंदिरों में इसकी गणना होती है।

भीमा नदी (इसे अपने चन्द्राकर की वजह से यहाँ चंद्रभागा भी पुकारा जाता है) के तट पर बने इस मंदिर में कृष्ण जी को विठोबा, विट्ठल और पंढरीनाथ के नाम से भी पुकारा जाता है. ये भी कहा जाता है के पंढरपुर का नाम एक पुंडलिक के नाम के बाबा पर पड़ा जो “हरि” यानि विष्णु जी के अनन्य भक्त थे और उन्हें आत्मज्ञान यहीं प्राप्त हुआ था।

13वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी के बीच यहाँ कई सारे संतो का आना जाना रहा और अपनी भक्ति और रचनाओं से वो बहुत प्रसिद्द भी हुए हैं जिनमें सन्त नामदेव, सन्त ज्ञानेश्वर, सन्त तुकाराम प्रमुख हैं. अपने धार्मिक महत्व की वजह से पंढरपुर को महाराष्ट्र की आध्यात्मिक राजधानी भी कहा जाता है. आषाढ़ी एकादशी पर पुणे जिले के देहु गांव (जो कभी संत तुकाराम का निवास स्थान था) और आलंदी गांव (जो कभी संत ज्ञानेश्वर का निवास स्थान था) से लाखों श्रद्धालु पैदल इन गांव व आस पास के अन्य स्थानों से करीब 200-250 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर पंढरपुर पहुंचते हैं और विट्ठल से आशीर्वाद पाते हैं।

ये यात्रा अपने आप में अत्यंत अनूठी है। एक हिन्दू होने के नाते मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ की मुझे यहां पंढरी के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

मंदिर परिसर में कुल छ: प्रवेश द्वार हैं, पूर्वी प्रवेश द्वार को “नामदेव द्वार” से जाना जाता है. यहाँ विठोबा के अलावा माता रुक्मणि जी को भी पूजा जाता है, उनकी भी यहाँ मूर्ति स्थापित है. विष्णु जी को तुलसी अत्यंत प्रिय है जिसकी वजह से यहाँ विष्णु जी को तुलसी की माला चढाई जाती है. पंढरपुर के रेलवे स्टेशन की इमारत पर पंढरीनाथ की बिलकुल वैसी मूर्ति लगी है जैसी यहाँ के मुख्य मंदिर में स्थापित है. दिल्ली से यहाँ पहुँचने के लिए पुणे से पहले एक स्टेशन पड़ता है “दौंड” यहाँ से पंढरपुर की दूरी मात्र 140 किलोमीटर के आसपास है. नजदीकी हवाई अड्डा पुणे है।

“मथुरा का श्याम, वही अयोध्या का राम
पंढरी में हुआ विट्ठल यही नाम,
युगों युगों से खड़ा है भक्त प्रेम पाने हेतु
इसीलिए तीर्थ यही सारे तीर्थों में बडा है
चंद्रभागा में नहाए, दर्शन विट्ठल जी के पाए
तन मन खुशियों से लहराए, मन भर भर आए”
(अज्ञात)

तो आप कब जा रहें हैं पंढरपुर??
बोलो विट्ठल महाराज की जय.









Thursday, 9 April 2020

सरदार पोस्ट, गुजरात के शहीदों को शौर्य दिवस पर नमन

जनवरी 2020 में मैं दूसरी बार कच्छ के रण में था, इस बार मेरी तीव्र इच्छा थी रण में स्थित भारत पाकिस्तान बॉर्डर को देखने की और वहाँ बने ऐतिहासिक सरदार पोस्ट के दर्शन करने की, जहां 9 अप्रैल 1965 को सी आर पी एफ के छह जवान देश की सीमा की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे।
ये स्मारक कच्छ के रण में बने "इंडिया ब्रिज" से लगभग 80 किलो मीटर अंदर पड़ता है। 9 अप्रैल 1965 को पाकिस्तानियों की एक पूरी ब्रिगेड, जिसमें लगभग 3500 सैनिक थे, उन्होंने यहां बनी 'टाक' एवं 'सरदार पोस्ट' पर हमला बोल दिया था। उस समय तक बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स, यानि की, बी एस एफ का गठन नही था और यहां की सीमा की रखवाली का जिम्मा केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल यानि की सी आर पी एफ पर था।
ये समय अत्यंत कठिन था, लेकिन हमारे रण बांकुरों ने अपने शौर्य से पाकिस्तानियों के इरादों को धूल चटा दी और उनके 34 सैनिकों को मार गिराया और 4 को ज़िंदा पकड़ लिया। इस कार्यवाही में हमारे भी छह जवान शहीद हो गए और 19 को पाकिस्तान ने बंदी बना लिया। लेकिन हमारे जाँबाज़ जवानों ने 16 घण्टे तक चली इस आमने सामने की लड़ाई में दुश्मन को खदेड़ने में अभूतपूर्व सफ़लता अर्जित की। ये घटना कोई आम घटना नही है, विश्व में पहली बार ये देखने को मिला जब किसी अर्ध सैनिक बल की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन सेना की एक पूरी ब्रिगेड को ही खदेड़ दिया। इस काम को अंजाम केवल भारत माता के वीर सपूत ही दे सकते थे।
आज का दिन यानि की 9 अप्रैल सी आर पी एफ शौर्य दिवस के रूप में मनाती है और उन शहीदों को याद करती है, जिन्होंने इस महान कार्य में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। वर्तमान में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल देश का सबसे बड़ा अर्ध सैनिक बल है।
इस युद्ध स्मारक पर जाना मेरे लिए किसी तीर्थ यात्रा से कम नही था। काले पत्थर पर इन वीर शहीदों की गाथा अंकित है। ये स्मारक कुछ कुछ लद्दाख में बने रेज़ांगला शहीद स्मारक की याद दिला गया, जहां मेजर शैतान सिंह ने अपने 114 वीर अहीर सैनिकों के साथ अपने प्राणों की आहुति दे कर देश की अस्मिता की रक्षा की थी।
सरदार पोस्ट के सभी शहीदों व वीरों को ऋणी राष्ट्र की ओर से शत शत नमन और सी आर पी एफ को इतनी तत्परता व बहादुरी से देश की सेवा करने के लिए सलाम।
इन छह शहीदों के नाम थे
लांस नायक किशोर सिंह
लांस नायक गणपत राम
सिपाही शमशेर सिंह
सिपाही ज्ञान सिंह
सिपाही हरि राम
सिपाही सिद्धवीर सिंह प्रधान
इन पंक्तियों से अपनी बात को विराम देना चाहूंगा:
कुछ तो बात है,
मिट्टी में मेरे वतन की।
उपजते हैं यहाँ शूरवीर,
देश पर जान कुर्बान करने वाले।।
जय हिन्द।













Wednesday, 8 April 2020

बैरकपुर : मंगल पांडे का बलिदान स्थल


8 अप्रैल का दिन भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्यूंकी आज ही के दिन 1857 को भारत के स्वाधीनता की पहली सशस्त्र क्रांति के नायक मंगल पांडे को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी। पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में वो स्थान आज भी मौजूद है जहां मंगल पांडे को फांसी दी गयी थी। कितने ही दिनों या कहें बरसों की कोशिशें जो हमारे क्रांतिकारी अङ्ग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ कर रहे थे, पल भर में खाक हो गयी। बैरकपुर में ही अंग्रेजों ने अपनी पहली सैनिक छावनी स्थापित की थी।

मंगल पांडे अंग्रेजों की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की पैदल सेना में सिपाही थे और बैरकपुर में नियुक्त थे. 20 मार्च 1857 को सैनिकों को एक नए प्रकार की “एन्फ़िलड” की बंदूकें दी गयी, जिसमे नए प्रकार के कारतूस दिए गए, जिन्हें खोलने के लिए मुंह से लगा कर दांतों का प्रयोग करना पड़ता था. यही बात हिन्दू ब्राहमण परिवार में जन्मे मंगल पांडे को चुभ गयी और उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजा दिया. कई इतिहासकार इसे मात्र बगावत मानते हैं, जबकि अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध ये पहली सशस्त्र क्रांति थी।

जहाँ मंगल पांडे को फांसी दी गयी वो स्थान बैरकपुर की पुलिस अकादमी के अन्दर है. यहाँ उस जगह को देख कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, कैसे उस शूरवीर ने अकेले ही अङ्ग्रेज़ी हुकूमत को ललकारा होगा जबकि अपने अंत से वो अच्छी तरह से वाकिफ थे। भारतीय स्वतन्त्रता के एक सच्चे नायक मंगल पांडे को शत शत नमन।







साभार
देशभक्ति के पावन तीर्थ
लेखक : ऋषि राज
प्रभात प्रकाशन

Sunday, 15 December 2019

अरुण खेत्रपाल का बलिदान दिवस व विजय दिवस

1971 के युद्ध में आज ही के दिन जम्मू-कश्मीर के मैदानों की और बसंतर नदी के इलाके में हुई लड़ाई में एक 21 वर्ष के नौजवान ने जान की क़ुर्बानी दे कर तिरंगे का नाम रोशन किया और उस नौजवान सैन्य अधिकारी का नाम था- सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल । इन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। 

अरुण को नौकरी में आए अभी छह महीने ही हुए थे, पर हौसले बुलंद थे । बसंतर की लड़ाई को पाकिस्तानी बड़ा पिंड की लड़ाई के रूप में भी जानते हैं । अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्तूबर, 1950 को पुणे में हुआ था । सेना में 17 हॉर्स पुणे में कमान मिली । अरुण ने सनावर के स्कूल से अपनी शिक्षा प्राप्त की थी । अरुण के लिए इस क्षेत्र की सुरक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण थी, क्योकि इसी स्थान पर जम्मू और पंजाब को जोड़ने वाली सड़क मिलती थी । अपने टैंक को लेकर अरुण पाकिस्तानी सैनिकों से भिड़ गए और एक-एक कर दुश्मन के चार टैंकों को नष्ट कर दिया । इतने में एक गोला उनके टैंक पर आकर लगा, जिससे उनके टैंक में आग लग गई । अपने कमांडिंग अफसर द्वारा वापस बुलाए जाने पर अरुण ने कहा, ‘अभी मेरी बंदूक चल रही है और जब तक यह चल रही है, मैं दुश्मन पर वार करता रहूँगा ।‘ इतने शूरवीर थे अरुण । परंतु ज़्यादा घायल होने की वजह से वह शहीद हो गए ।

 दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में रहने वाले अरुण खेत्रपाल को सर्वोत्तम वीरता पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया । इस युद्ध क्षेत्र में भारत की ओर से पूना हॉर्स और पाकिस्तान की लेंसर्स रेजीमेंट एक-दूसरे के आमने-सामने थी । दुर्भाग्यवश आज़ादी से पहले यह दोनों रेजीमेंट एकीकृत बोम्बे कैवेलरी का हिस्सा थी । 1999 के कारगिल युद्ध तक अरुण खेत्रपाल परमवीर चक्र पाने वाले सबसे छोटी आयु वाले सैन्य अधिकारी थे वर्ष 1999 में ये गौरव ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को प्राप्त हो गया। 
अरुण खेत्रपाल कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टेन विजयंत थापर के आदर्श थे। उनकी जीवन शैली अरुण खेत्रपाल से अत्यन्त प्रभावित थी। एक अजब संयोग है कि दोनों वीरों के पिता भारतीय सेना में अधिकारी रह चुके हैं। 

एक और महान घटना आज ही के दिन घटित हुई , यानी की 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के 93000 सैनिकों ने भारतीय सेना के आगे हथियार डाल कर युद्ध में हार स्वीकार की थी। सेना और भारत के इतिहास में , ये जीत अब तक की सबसे बड़ी जीत साबित हुई। ये बात अलग है कि देश का राजनैतिक नेतृत्व इसका संपूर्ण फायदा नहीं उठा पाया। तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष सैम मानेकशॉ के नेतृत्व की जितनी प्रशंशा की जाए कम है। 

 आइए इस विजय दिवस, महावीर अरुण खेत्रपाल और अपने महान सैनिकों की वीर गाथाओं से आज की युवा पीढ़ी को अवगत करवाएँ। 

अरुण खेत्रपाल की शहादत को शत शत नमन और विजय दिवस की हर हिंदुस्तानी को ढेरों बधाई। 

जय हिंद जय भारत।

Saturday, 14 December 2019

सरदार पटेल की पुण्य तिथि पर उनके पैतृक निवास पर नमन

आज यानि कि 15 दिसंबर को लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की पुण्य तिथि है। सरदार ने अंतिम सांस मुम्बई के बिड़ला हाउस में ली जहां उन्हें हृदय आघात आया जो उनके लिए घातक सिद्ध हुआ और उनके प्राण ले गया और इस प्रकार से 15 दिसंबर 1950 को वो स्वर्ग सिधार गए। 

 सरदार पटेल का जन्म 31 अक्तूबर 1875 को अपने ननिहाल गुजरात के नाडियाड में हुआ था, पर उनके जीवन के आरम्भिक कई सारे वर्ष आनंद ज़िले में "करमसद" नामक स्थान पर बीते।

 आज मैं आपको उनके मेमोरियल व उनके घर के दर्शन करवा रहा हूँ, जहां उनका लालन पालन हुआ। अप्रैल 2018 में मुझे इस पवित्र स्थान के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ये तो आप सभी जानते हैं कि जब भारत को आज़ादी की सौगात मिली तो देश 565 रियासतों में बंटा हुआ था और फिरंगियों ने सभी रियासतों को अपनी इच्छा अनुसार भारत या पाकिस्तान में विलय होने की आज़ादी दे दी थी। सभी देशवासी सरदार पटेल के सदैव ऋणी रहेंगे क्योंकि उनकी दृढ़इच्छा शक्ति की वजह से ही सभी 565 फ़ूल एक टोकरी में एकत्रित हो पाए और हमारे स्वर्णिम भारत का निर्माण होना संभव हो पाया। 

इस कठिन कार्य का निष्पादन निश्चित तौर पर अत्यंत कठिन था पर ये सरदार की दूर दृष्टि, सूझ बूझ और दृष्ट इच्छा शक्ति का ही परिणाम था के हमारे राष्ट्र का निर्माण हो पाया, वर्ना अंग्रेजों ने तो जाते जाते भी हमें प्रताड़ित करने में कोई कसर नही छोड़ी थी। इस महान विभूति को शत शत नमन। 

जय हिंद।

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों को उनके बलिदान दिवस पर नमन

मित्रों, आज का दिन न केवल वायु सेना बल्कि देश के इतिहास में भी अत्यंत यादगार है, क्योंकि आज ही के दिन, 14 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान द्वारा श्रीनगर एयर बेस पर अचानक हुए हमले को फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों ने अपने प्राणों का बलिदान दे कर उस हमले का मुँह तोड़ जवाब दिया था. आज का ब्लॉग उनकी शहादत को समर्पित है.  
 
वायु सेना को आज तक केवल एक बार ही परमवीर वीर मिला है और वो मिला है शूरवीर निर्मल जीत सिंह सेखों को. 17 जुलाई 1945 को पंजाब के लुधियाना में इनका जन्म हुआ. इनके पिता जी भी भारतीय वायु सेना में थे. बचपन से ही इनका जहाज़ उड़ाने का सपना था. यही सपना जूनून बना और ये वायु सेना में फाइटर पायलट बन गए. 1971 के युद्ध में उनकी तैनाती श्रीनगर एयर बेस पर थी. पाकिस्तान यहाँ हमला करने के नापाक मंसूबे बना चुका था. पाकिस्तान ने प्लान बनाया की पुंछ के पहाड़ों तक वो लो फ्लाइंग करेंगे और पुंछ से एक दम 16000 फीट पर अपने लड़ाकू जहाजों को उठा लेंगे. उनको पता था पुंछ के बाद ही वो भारतीय वायु सेना के राडार द्वारा दिखाई दी सकते हैं लेकिन तब तक भारतीय वायु सेना को सँभालने का समय नहीं मिलेगा क्योंकि पुंछ से श्रीनगर की हवाई दूरी केवल 6 मिनट की थी. इसी प्लान के साथ उन्होंने 14 दिसंबर 1971 को श्रीनगर एयर बेस पर हमला बोल दिया. भारत के लिए करो या मरो की स्तिथि आ गयी क्योंकि श्रीनगर एयर बेस को हर हाल में बचाना जरूरी था. 

गोलाबारी के बीच एक नौजवान सिख किसी तरह बचते बचाते अपने विमान तक आया और उड़ान भरते ही पाकिस्तानी विमानों को निशाना बनाने लगा देखते ही देखते दुश्मन के खेमे में हलचल मच गयी उनका इस बात का इल्म नहीं था की ऐसा भी हो सकता है. सेखों ने दुश्मन के दो विमानों  को तहस नहस कर दिया पर उनकी संख्या ज्यादा थी. सेखों के विमान में आग लग गयी और जब वो पैराशुट से कूदे तो बच नहीं पाए और शहीद हो गए. उनको मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाज़ा गया. दिल्ली के एयर फ़ोर्स म्यूजियम में उनकी प्रतिमा लगी हुई है जहाँ उनका विमान भी दिखाया गया है. लुधियाना शहर में भी उनकी प्रतिमा लगी हुई है. 
ऐसे निर्भीक, महावीर और जांबाज़ को हमारा शत शत नमन. जय हिन्द, जय भारत.

Friday, 13 December 2019

जमेदार नन्द सिंह जी के बलिदान दिवस पर उनको नमन

12 दिसंबर को  एक ऐसे शूरवीर का बलिदान दिवस था, जिन्हें भारत का सबसे सुसज्जित सैनिक यानि की मोस्ट डेकोरेटेड सैनिक भी कहा जाता है. दूसरे विश्व युद्ध में उन्हें विक्टोरिया क्रॉस और फिर वर्ष 1947-48 की कश्मीर की लड़ाई में उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। इस शूरवीर का नाम है -जमेदार नन्द सिंह. इस अवसर पर समस्त देश वासियों की ओर से उनकी शहादत को नमन। 

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इन्होने बर्मा में अभूतपूर्व वीरता का प्रदर्शन किया जिसकी वजह से इन्हें उस समय के सर्वोच्च सेना सम्मान "विक्टोरिया क्रॉस" से सम्मानित किया गया. देश आज़ाद होते ही हमारे ऊपर पाकिस्तान ने युद्ध थोप दिया और कश्मीर पर कब्ज़ा करने के लिए वहाँ हमला बोल दिया. उड़ी सेक्टर में जहाँ नन्द सिंह साहब की तैनाती थी उन्होंने पूरी वीरता के साथ दुश्मन का सामना किया और अत्यंत साहस और बुद्धिमता का प्रदर्शन करते हुए दुश्मन को भारी नुकसान पहुँचाया, पर उन्हें अपना सर्वोच्च बलिदान देना पड़ा. कहा जाता है कि दुश्मन को जब उनके मृत शरीर पर "विक्टोरिया क्रॉस" का रिबन लगा दिखाई दिया तो उन्होंने उनकी लाश को ट्रक से बांध कर घुमाया और कहीं फ़ेंक दिया। 

वर्ष 2018 में अपने लन्दन प्रवास के दौरान मुझे "हाइड पार्क" में जाने का सुअवसर मिला जहां विश्व युद्ध में विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित जांबाज़ सैनिकों की याद में स्मारक बना हुआ है। यहां नन्द सिंह साहब का नाम देख गर्व की अनुभूति हुई। इस महान योद्धा को शत शत नमन।
Hyde Park Memorial, London

Hyde Park Memorial, London


Jemadar Nand Singh, VC, MVc, (Photo Courtesy Lest we forget)

Thursday, 9 May 2019

कारगिल युद्ध नायक अमर शहीद विक्रम बत्रा के माता पिता से एक मुलाकात

कारगिल युद्ध में "ये दिल मांगे मोर" का नारा बुलंद करने वाले शूरवीर, दुश्मन जिन्हें अपने शौर्य की वजह से शेरशाह के नाम से पुकारता था। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ, कैप्टेन विक्रम बत्रा की. मात्र 25 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर देने वाले पराक्रमी कैप्टेन विक्रम बत्रा के माता पिता के चरणों में वंदन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पॉइंट 5140 को फतह करने के बाद पॉइंट 4875 को फतह करते हुए विक्रम बत्रा शहीद हुए थे। इस अदम्य साहस का प्रदर्शन करने के लिए उन्हें परमवीर चक्र (मरणोंप्रांत) से सम्मानित किया गया था.
उनके सम्मान में इस चोटी को अब बत्रा टॉप के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा एक आर्मी कैम्प का नाम भी बत्रा ट्रांजिट कैम्प कर दिया गया है। हम सभी परमवीर चक्र से सम्मानित विक्रम बत्रा के सदैव ऋणी रहेंगें। इस महावीर को हमारा शत शत नमन।

 जय हिन्द.










Tuesday, 7 May 2019

शहीद मास्टर अमीर चंद, अवध बिहारी और भाई बाल मुकुन्द के शहीदी दिवस पर नमन

आज मैं इतिहास के कुछ ऐसे पन्ने पलट रहा हूँ जिसे  देशवासियों, विशेषकर,  दिल्ली वालों को अवगत करवाना अत्यंत आवश्यक है। आज का दिन दिल्ली के इतिहास में सदैव याद रखा जाएगा क्योंकि आज ही के दिन यानी 8 मई को तीन और 9 मई को एक अन्य क्रांतिकारी को अंग्रेजी हुकूमत ने फाँसी पर लटका दिया था। इन चारों क्रांतिकारियों के नाम थे मास्टर अमीर चंद, बसंत कुमार बिस्वास, मास्टर अवध बिहारी और भाई बाल मुकुन्द। दिसंबर 1912 में जब भारत की राजधानी को दिल्ली शिफ़्ट करने के अवसर पर तत्कालीन गवर्नर जरनल की शोभा यात्रा जब चाँदनी चौक क्षेत्र से निकल रही थी उस पर बम्ब फैंकने का काम इन चारों शूरवीरों ने सम्पन्न किया। हमले में गवर्नर बच गया पर इन चारों को फाँसी दे दी गयी।

8 मई, 1915 को दिल्ली में अमीर चंद, अवध बिहारी, बाल मुकुंद को फांसी दी गई थी, लेकिन बसंत कुमार बिस्वास को एक दिन बाद अंबाला सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी।

 दिल्ली में इन तीन शहीदों को जहां फाँसी पर चढ़ाया गया था वो स्थान 'शहीद स्मारक' मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज (एम.ए.एम.सी.) दिल्ली, परिसर के अंदर है ।  स्वतंत्रता संग्राम के इन नायकों को इस फांसी घर में जा कर नमन कर मेरा जीवन सफल हो गया। कुछ वर्ष पहले ही दिल्ली के लुड़लौ कैसल स्कूलों के नाम इन शहीदों के नामों पर रखे गए हैं। सौभाग्यवश, मैं भी उन्हीं में से एक स्कूल में पढ़ा हूँ।

पुराने दिल्ली जेल परिसर के इस फांसी घर के दर्शन आप भी करें और इन शहीदों को अपनी भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करें। जय हिन्द।






Sunday, 5 May 2019

एक मुलाकात कर्नल नरेन्द्र बुल कुमार से

कुछ दिन पूर्व  एक ऐसी शख्सियत से रूबरू होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो सही मायनों में महानायक हैं। 85 वर्षीय कर्नल नरेंद्र "बुल" कुमार  1965 में भारत के प्रथम विजेता एवेरेस्ट दल के डिप्टी लीडर थे। इसके अलावा कर्नल साहब ने कई सारी चोटियाँ फतेह की हैं, जिसमें भारत की सबसे ऊंची व विश्व की तीसरी सबसे ऊंची चोटी "कंचनजंगा" भी शामिल है। ये एक मात्र ऐसे अधिकारी हैं जिन्हें कर्नल रैंक में परम वशिष्ठ सेवा मेडल से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा इन्हें कीर्ति चक्र, पदम श्री, अति वशिष्ठ सेवा मैडल व अर्जुन पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है।

इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही कि इन्होंने सियाचिन का बड़ा भाग पाकिस्तान के हाथ जाने से रोक दिया। आज सियाचिन का बड़ा भू भाग हमारे पास केवल और केवल कर्नल कुमार की बदौलत ही है। मैंने जब इनको अपनी पुस्तक भेंट की तो इन्होंने भी तुरंत मुझे अपने कंचनजंगा की फतेह की कहानी बताती अपनी पुस्तक भेंट में दी, जो मेरे लिए अनमोल है।

सेना के इस वीर और भारत माता के पुत्र को ईश्वर लंबी आयु व स्वस्थ जीवन प्रदान करें।

जय हिंद।

Sunday, 30 December 2018

दर्शन धनुषकोटि के, यहाँ से रामेश्वरम के लिए पुनः चलेगी रेल गाड़ी


प्रिय मित्रों

सादर नमस्कार

बीते सप्ताह रेल मंत्रालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, पता नहीं आपने ध्यान दिया है या नहीं, वो निर्णय है रामेश्वरम तक जाने वाली गाड़ी को धनुषकोटि तक पुनः स्थापित करने का। अब ये महत्वपूर्ण इस लिए है क्यूंकी  “धनुषकोटि” जो की सुदूर दक्षिण में स्थित है, ये वही स्थान है जहां से राम सेतु की शुरुआत होती है। आज मैं आपको ब्लॉग के माध्यम से धनुषकोटि के बारे में विस्तार से जानकारी दूंगा।  वर्ष 2010 में मुझे रामेश्वरम् जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, इसी यात्रा के दौरान मैं धनुषकोटि तक गया।

जो की रामेश्वरम् से 19 कि.मी. की दूरी पर है । 1964 में आए समुद्री तूफान ने यहाँ के भूगोल को सदा सदा के लिए बदलकर रख दिया। इस तूफान में धनुषकोटि स्टेशन पूरी तरह बरबाद हो गया था और पटरियाँ तक उखड़ गई थीं। आज भी उखड़ी हुई पटरियाँ रामेश्वरम् और धनुषकोटि के बीच में पड़ी हुई  देखी जा सकती हैं। यहाँ मैं बताना चाहूँगा कि 1964 तक गाड़ी मद्रास एग्मोर (अब चेन्नई एग्मोर) से धनुषकोटि तक जाती थी। ऐतिहासिक पंबम पुल रामेश्वरम् को मुख्य भारत से जोड़ता है । पंबम पुल देश का एकमात्र ऐसा पुल है, जो समुद्र से गुजरनेवाले बड़े जहाजों को रास्ता देने के लिए खुल जाता है। इसका निर्माण 1914 में हुआ था। 1964 के तूफान ने इसको भी बुरी तरह से हिला दिया था, परंतु भारतीय रेल की इंजीनियरिंग टीम (जिसका नेतृत्व डॉ. श्रीधरन कर रहे थे) ने 45 दिनों के रिकॉर्ड समय में ही पुल को ठीक कर दिया था। 

सन् 1964 के तूफान ने हज़ारों जानें ले ली थीं। एक पूरी की पूरी यात्री गाड़ी जो मद्रास से धनुषकोटि जा रही थी जिसमें 100 के लगभग यात्री थे, समुद्र में जा
डूबी आर सभी यात्री मारे गए। धनुषकोटि में आज सिर्फ कुछ मछुआरे परिवार ही रहते हैं। एक मंदिर जो आज जमीन में धंसा हुआ है और टूटा-फूटा रेलवे रोड तथा प्लेटफार्म आज भी यहाँ मौजूद हैं। 1964 तक लोग यहाँ तक रेलगाड़ी में आकर नावों द्वारा श्रीलंका के तल्लईमन्नार चले जाते , जो कि यहाँ से केवल 30 कि.मी. की दूरी पर है। 1964 के बाद से यह सब रुक गया। इस स्थान को अरब सागर और बंगाल की खाड़ी का संगमस्थल भी कहा जाता है। यहाँ तक पहुँचने के लिए रामेश्वरम् से जीप लेनी पड़ती है, क्योंकि जमीन दलदली होने के कारण आम वाहन नहीं जा सकता।

 हिंदू शास्त्रों के अनुसार यही वह स्थान है, जहाँ से रामसेतु शुरू होता है, जिसका वर्णन पवित्र ग्रंथ 'रामायणमें भी है। इस सेतु का निर्माण श्रीरामजी ने लंका जाने के लिए किया था। रामसेतु होने के कई प्रमाण हमारे वैज्ञानिकों को भी मिले हैं । इतनी ऐतिहासिक जगह पर आने के लिए मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। पिछली केंद्रीय सरकार इस रामसेतु से नया रास्ता निकालना चाहती थी, पर अब मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि रामसेतु एक राष्ट्रीय धरोहर है। और इससे किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी, अपितु जहाजों के लिए वैकल्पिक रूट खोजा जाएगा। जनवरी का महीना होने के बावजूद यहाँ गरमी महसूस हो रही थी। मैंने एक बुढ़िया का चित्र लिया जो वहाँ पानी बेच रही थी ।

मैंने अपने जेहन में जब रामायण काल के समय की काल्पनिक तसवीर बनाई तो एक अद्भुत अनुभूति हुई और गौरव महसूस हुआ कि हम वहाँ खड़े थे जहाँ कभी श्रीराम खड़े हुए थे। मुझे ये सुन कर अत्यंत हर्ष हुआ की रेल मंत्रालय धनुषकोटि तक पुनः गाड़ी ले कर जा रही है, चलो किसी ने तो इस ऐतिहासिक स्थल की सुध ली । ये कोई साधारण कार्य नहीं है अपितु हमारी गरिमा व आस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जो शीघ्र पूरा हो जाएगा। अब अगर सरकार यहाँ से श्रीलंका के तल्लईमन्नार के लिए जल मार्ग भी शीघ्र खोल दे तो कम से कम जो हिन्दू श्रद्धालु श्रीलंका में रामायण से जुड़े जो स्थान हैं उनके भी सुगमता व कम पैसों में दर्शन कर पाएंगे।