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Saturday, 14 December 2019

सरदार पटेल की पुण्य तिथि पर उनके पैतृक निवास पर नमन

आज यानि कि 15 दिसंबर को लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की पुण्य तिथि है। सरदार ने अंतिम सांस मुम्बई के बिड़ला हाउस में ली जहां उन्हें हृदय आघात आया जो उनके लिए घातक सिद्ध हुआ और उनके प्राण ले गया और इस प्रकार से 15 दिसंबर 1950 को वो स्वर्ग सिधार गए। 

 सरदार पटेल का जन्म 31 अक्तूबर 1875 को अपने ननिहाल गुजरात के नाडियाड में हुआ था, पर उनके जीवन के आरम्भिक कई सारे वर्ष आनंद ज़िले में "करमसद" नामक स्थान पर बीते।

 आज मैं आपको उनके मेमोरियल व उनके घर के दर्शन करवा रहा हूँ, जहां उनका लालन पालन हुआ। अप्रैल 2018 में मुझे इस पवित्र स्थान के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ये तो आप सभी जानते हैं कि जब भारत को आज़ादी की सौगात मिली तो देश 565 रियासतों में बंटा हुआ था और फिरंगियों ने सभी रियासतों को अपनी इच्छा अनुसार भारत या पाकिस्तान में विलय होने की आज़ादी दे दी थी। सभी देशवासी सरदार पटेल के सदैव ऋणी रहेंगे क्योंकि उनकी दृढ़इच्छा शक्ति की वजह से ही सभी 565 फ़ूल एक टोकरी में एकत्रित हो पाए और हमारे स्वर्णिम भारत का निर्माण होना संभव हो पाया। 

इस कठिन कार्य का निष्पादन निश्चित तौर पर अत्यंत कठिन था पर ये सरदार की दूर दृष्टि, सूझ बूझ और दृष्ट इच्छा शक्ति का ही परिणाम था के हमारे राष्ट्र का निर्माण हो पाया, वर्ना अंग्रेजों ने तो जाते जाते भी हमें प्रताड़ित करने में कोई कसर नही छोड़ी थी। इस महान विभूति को शत शत नमन। 

जय हिंद।

Wednesday, 16 August 2017

गुजरात का भालका तीर्थ : जहाँ श्री कृष्ण ने किया था अपने प्राणों का त्याग

दोस्तों, आशा है आप सभी ने स्वतंत्रता दिवस और श्री कृष्ण जन्माष्टमी पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया होगा. आज मै आपको श्री कृष्ण जी से जुड़े एक ऐसे स्थान पर ले कर चल रहा हूँ जहाँ से उन्होंने स्वर्ग लोग की ओर कूच किया था. इस स्थान का नाम है, “भालका तीर्थ”, ये गुजरात के “वेरावल” में स्थित है और प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ जी मात्र पांच किलोमीटर की दूरी पर है.

इस प्रसंग से तो आप सभी भली भांति परिचित होंगे की जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो रहा था तभी गांधारी ने श्री कृष्ण को श्राप दिया था की जिस प्रकार से यादवों ने कुरु वंश का नाश किया है वैसे ही तुम्हारा यानि की यदुवंशियों का 36 वर्षों के पश्चात नाश हो जायेगा. समय चक्र ने जब 36 वर्ष पूरे किये तो उस समय यदुवंशियों में आपसी द्वेष चरम पर था जिससे खिन्न हो कर बलराम जी ने योग द्वारा शरीर का त्याग किया और श्री कृष्ण जंगल की ओर समाधी अवस्था में चले गए वहां एक पीपल के पेड़ के नीचे समाधी लगा ली, एक दिन “जरा” नामक शिकारी ने उनके बाएं पैर के तलुवे पर एक मृग का मुख समझ कर तीर चला दिया, जिससे भगवान कृष्ण का पैर घायल हो गया. ये सब देख शिकारी विलाप करने लगा तब श्री कृष्ण ने उसको बताया की तुम त्रेता युग में बाली थे और मै राम था., ये सब मेरी ही लीला थी. जिस पीपल के वृक्ष के नीचे  श्री कृष्ण बैठे थे वो वृक्ष आज भी इस मंदिर प्रांगण में मौजूद है. लगभग 5100 वर्ष पुराना ये पेड़ आज तक हरा भरा है जो अपने आप में चमत्कार है.


श्री कृष्ण ने जरा का अपराध क्षमा कर दिया और घायल पैर के साथ वहां से करीब 1.5  किलोमीटर दूर हिरण नदी पर जा कर अपने शरीर समेत स्वर्गलोक की ओर कूच कर गए. श्री कृष्ण के धरती से स्वर्ग प्रस्थान को द्वापर युग का अंत और कलयुग की शुरुआत माना जाता है. इसी हिरण नदी के तट पर आज भी उनके चरण दर्शन किये जा सकते हैं, इसी वजह से इस स्थान को “देहोत्सर्ग तीर्थ” भी कहा जाता है. आप जब भी भालका तीर्थ जाएं तो सोमनाथ दर्शनों के साथ साथ शेरों के लिए विश्व प्रसिद्द “गिर” अभ्यारणय और दीव जाना न भूलें. 



फोटो आभार श्री सोमनाथ ट्रस्ट 

फोटो आभार श्री सोमनाथ ट्रस्ट
















     

Tuesday, 28 February 2017

गुजरात में सिन्धु घाटी सभ्यता काल के स्थान "लोथल" की सैर

प्रिय मित्रों,
सादर नमस्कार!!

आज मैं आपको गुजरात के अहमदाबाद से मात्र 80 किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसी जगह पर ले कर चल रहा हूँ, जिसका इतिहास करीब 4200 वर्ष पुराना है, इसका नाम है “लोथल” इस शब्द का निर्माण दो शब्दों लो और थल के संगम से हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ है “मृत्यु का स्थान”. इसका संबंध सिन्धु घाटी सभ्यता से है. इतिहासकारों का मत है की “लोथल” सिन्धु घाटी सभ्यता के समय का ना केवल सबसे प्रमुख बंदरगाह बल्कि, ये दुनिया का सबसे पुरातन बंदरगाह भी था. इस स्थान की खुदाई प्रोफेसर एस आर राव की देख रेख में वर्ष 1955 से 1962 के दौरान की गयी थी. इसी खुदाई से दुनिया को इस स्थान के महत्व का पता चला. खुदाई में पक्की ईंटों से बने स्नानागार, ढकी हुई नालियाँ, स्वच्छ जल के कुएँ, जलाशय नुमा गोदी और माल गोदाम भी निकले.







वर्ष 1976 में यहाँ एक म्यूजियम की स्थापना की गयी जिसमे यहाँ खुदाई में मिली कई वस्तुएं जैसे की पुराने मिटटी के बर्तन, हाथी दांत से बना सामान, मनके, मुद्रा एवं मुद्रांकन आदि प्रदर्शित की गयी हैं. म्यूजियम में कुल तीन गैलरियों में विभाजित किया गया है. लोथल के निर्माण में इस्तेमाल की गयी इंटें आज भी सही सलामत हैं. लोथल का व्यापार अफ्रीका और पश्चिम एशिया तक फैला हुआ था.

तो इतिहास के पन्ने पलट कर आपको कैसा लगा???