Wednesday, 16 August 2017

गुजरात का भालका तीर्थ : जहाँ श्री कृष्ण ने किया था अपने प्राणों का त्याग

दोस्तों, आशा है आप सभी ने स्वतंत्रता दिवस और श्री कृष्ण जन्माष्टमी पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया होगा. आज मै आपको श्री कृष्ण जी से जुड़े एक ऐसे स्थान पर ले कर चल रहा हूँ जहाँ से उन्होंने स्वर्ग लोग की ओर कूच किया था. इस स्थान का नाम है, “भालका तीर्थ”, ये गुजरात के “वेरावल” में स्थित है और प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ जी मात्र पांच किलोमीटर की दूरी पर है.

इस प्रसंग से तो आप सभी भली भांति परिचित होंगे की जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो रहा था तभी गांधारी ने श्री कृष्ण को श्राप दिया था की जिस प्रकार से यादवों ने कुरु वंश का नाश किया है वैसे ही तुम्हारा यानि की यदुवंशियों का 36 वर्षों के पश्चात नाश हो जायेगा. समय चक्र ने जब 36 वर्ष पूरे किये तो उस समय यदुवंशियों में आपसी द्वेष चरम पर था जिससे खिन्न हो कर बलराम जी ने योग द्वारा शरीर का त्याग किया और श्री कृष्ण जंगल की ओर समाधी अवस्था में चले गए वहां एक पीपल के पेड़ के नीचे समाधी लगा ली, एक दिन “जरा” नामक शिकारी ने उनके बाएं पैर के तलुवे पर एक मृग का मुख समझ कर तीर चला दिया, जिससे भगवान कृष्ण का पैर घायल हो गया. ये सब देख शिकारी विलाप करने लगा तब श्री कृष्ण ने उसको बताया की तुम त्रेता युग में बाली थे और मै राम था., ये सब मेरी ही लीला थी. जिस पीपल के वृक्ष के नीचे  श्री कृष्ण बैठे थे वो वृक्ष आज भी इस मंदिर प्रांगण में मौजूद है. लगभग 5100 वर्ष पुराना ये पेड़ आज तक हरा भरा है जो अपने आप में चमत्कार है.


श्री कृष्ण ने जरा का अपराध क्षमा कर दिया और घायल पैर के साथ वहां से करीब 1.5  किलोमीटर दूर हिरण नदी पर जा कर अपने शरीर समेत स्वर्गलोक की ओर कूच कर गए. श्री कृष्ण के धरती से स्वर्ग प्रस्थान को द्वापर युग का अंत और कलयुग की शुरुआत माना जाता है. इसी हिरण नदी के तट पर आज भी उनके चरण दर्शन किये जा सकते हैं, इसी वजह से इस स्थान को “देहोत्सर्ग तीर्थ” भी कहा जाता है. आप जब भी भालका तीर्थ जाएं तो सोमनाथ दर्शनों के साथ साथ शेरों के लिए विश्व प्रसिद्द “गिर” अभ्यारणय और दीव जाना न भूलें. 



फोटो आभार श्री सोमनाथ ट्रस्ट 

फोटो आभार श्री सोमनाथ ट्रस्ट
















     

Saturday, 5 August 2017

यूनेस्को विश्व विरासत स्थल : एलोरा की गुफाओं की सैर

प्रिय मित्रों,
सादर नमस्कार !!!

आज मैं आपको यूनेस्को विश्व विरासत में शामिल भारत वर्ष के ऐसे स्थान पर ले कर चल रहा हूँ जिसे देख कर आपको अपने भारतीय होने पर गर्व की अनुभूति होगी, जी हाँ आज मैं आपको ले कर चल रहा हूँ महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले में स्थित “एलोरा” की गुफाओं में. एलोरा को वेरुल के नाम से भी जाना जाता है. प्राचीन भारतीय शिल्प कला का अद्भुत नमूना “एलोरा” की गुफाएं अवश्य ही देखने लायक हैं. यहाँ कुल 34 गुफाएं हैं जिनकी उम्र 1400 वर्ष पुरानी है, जी हाँ, सही पढ़ा 1400 वर्ष!! पांचवी से ग्याहरवीं सदी के बीच बनी इन गुफाओं की कुल संख्या 34 है. अपनी पाषण शिल्प स्थाप्त्य कला की वजह से वर्ष 1983 में इन गुफाओं को यूनेस्को विश्व विरासत स्थल में स्थान दिया गया.

जिनमें 1 से 12 गुफाएं बौध धर्म से सम्बंधित हैं और एलोरा के दक्षिणी भाग में स्थित हैं, इसके बाद 13 से 29 गुफाएं हिन्दू धर्म से सम्बंधित हैं और एलोरा के मध्य भाग में स्थित हैं और अंत में 30 से 34 अंक की गुफाएं जैन धर्म से सम्बंधित हैं और एलोरा के उत्तरी भाग में स्थित हैं.
एलोरा में सबसे महत्वपूरण संरचना गुफा संख्या 16 में बना कैलास मंदिर है, जिसकी गणना विश्व की सबसे बड़े विखंड सरंचना यानि की “मोनोलिथिक स्ट्रक्चर” के रूप में होती है. इस कैलास मंदिर का निर्माण एक बड़े पहाड़ को ऊपर से नीचे तराशते हुए किया गया है. कहा जाता है कि इस मंदिर के निर्माण में करीब 200 वर्षों का समय लगा और 10 पीढ़ियों का जीवनकाल इसे बनाने में समर्पित हो गया. ऐसा माना जाता है की कैलास मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट राजाओं के वंशजों ने करवाया. 
    
एलोरा की गुफाएं तीन प्रमुख धर्मों हिन्दू, बौध और जैन का प्रतिनिधित्व करती हैं, कमाल की बात ये है के तिब्बत में स्थित कैलाश पर्वत पर भी इन्ही तीनों धर्मों के लोग जाते हैं. एलोरा की गुफाएँ देखने के लिए दिल्ली से सीधी ट्रेन और फ्लाइट की व्यवस्था है वैसे मुंबई से यहाँ की दूरी 380 किलोमीटर है और रोजाना कई सारी गाड़ियाँ मुंबई और औरंगाबाद के बीच चलती हैं. प्रसिद् घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग यहाँ से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इसके अलावा कई सारे पर्यटन स्थल हैं औरंगाबाद में. तो कब जा रहें हैं आप एलोरा की गुफाएं देखने.






















कैलाश मंदिर में बना विराट शिवलिंग 




Saturday, 22 July 2017

चन्द्र शेखर आज़ाद के जन्मदिवस पर उनके जन्मस्थान पर नमन

प्रिय मित्रों
सादर नमस्कार !!!
आज वीर शिरोमणि शहीद चन्द्र शेखर आज़ाद जी का जन्मदिन है. इस पुण्य अवसर मैं आपको ले कर चल रहा हूँ उनके जन्मस्थान जो मध्य प्रदेश के अलीराजपुर ज़िले के ग्राम भाबरा में है, पिछले ही वर्ष मुझे वहाँ शीश नवाने का सौभाग्य मिला था। जन्मस्थल से नजदीकी रेलवे स्टेशन गुजरात का दाहोद है जो यहाँ से करीब 40 किलोमीटर दूर है। उनके सम्मान में "भाबरा" का नाम चन्द्र शेखर नगर कर दिया गया है।
चन्द्र शेखर आज़ाद जी जन्म 23 जुलाई 1906 को पंडित सीताराम तिवारी और श्रीमती जगरानी देवी जी के यहाँ हुआ। भारत के क्रन्तिकारी आंदोलन के प्रमुख माने जाने वाले आज़ाद का बचपन का नाम चन्द्र शेखर तिवारी था। इनका एक ही फलसफ़ा था और वो था "आज़ाद जीने का और आज़ाद ही मरने का", और हुआ भी ऐसा ही। इलाहबाद के चन्द्र शेखर आज़ाद पार्क में अंग्रेजों द्वारा घेर लिए जाने पर, स्वयं को गोली मार ली पर अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आए और इस दुनिया से आज़ाद ही गए। भगत सिंह चन्द्र शेखर आज़ाद को अपना आदर्श मानते थे. 
आज़ादी की 70 वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में पिछले महीने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भी यहाँ आ कर श्रद्धा सुमन अर्पित कर चुके हैं।
ऐसी पावन धरती और ऐसे वीर सपूत को मेरा शत् शत् वंदन। जय हिन्द जय भारत।