Saturday, 6 October 2018

कोहिमा में कारगिल युद्ध नायक कैप्टन केनगुरुसे (महावीर चक्र) के युद्ध स्मारक पर नमन

पिछले सप्ताह अपनी कोहिमा यात्रा के दौरान मेरा ये लक्ष्य था की मुझे कोहिमा से करीब 22 किलोमीटर दूर एक गांव "नेरहेमा" जाना है, जहां एक महावीर, कारगिल युद्ध के अमर शहीद कैप्टेन केन्गुरसे का जन्म हुआ था। कारगिल युद्ध में अत्यंत असाधारण वीरता का प्रदर्शन करने के लिए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया था। इसी स्थान पर उनकी शहादत को सदा सदा के लिए याद करता एक स्मारक बनाया गया है, जहां नमन करना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य की बात थी।

26 जून 1999 की वो रात को जब कारगिल युद्ध अपने चरम पर था, 16000 फ़ीट की ऊंचाई और तापमान था माइनस 16 डिग्री, जगह थी द्रास की "ब्लैक रॉक" नामक चोटी। 2 राजपूताना राइफल्स के शूरवीर दुश्मन पर जीत के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए मौत का सेहरा सर पर बांध तैयार बैठे थे। शत्रु के बंकर को तोड़ना अत्यंत आवश्यक हो गया था।

कैप्टेन केन्गुरसे ने इस खड़ी चट्टान पर चढ़ने के लिए अपने जूते खोल दिए ताकि शीघ्रता और सुगमता से चढ़ा जा सके। दुश्मन भयंकर गोलाबारी कर रहा था। ऊपर बैठा दुश्मन हमेशा फायदे की स्तिथि में होता है। पर हमारे सैनिकों के हौसले बुलंद थे। दुश्मन की गोलाबारी में घायल होने के बावजूद कैप्टेन केन्गुरसे ने अपनी बंदूक से दो पाकिस्तानियों को हलाक कर दिया और अपने कमांडो चाकू से दो अन्य पाकिस्तानियों को मौत के घाट उतार कर अपनी पलटन की विजय सुनिश्चित की। पर स्वयं की जान भारत माता पर कुर्बान कर सेना की सर्वोच्च परम्पराओं का पालन किया।

15 जुलाई 1974 को नेरहेमा, कोहिमा ज़िला, नागालैंड में इनका जन्म हुआ। 1994 से 1997 तक कोहिमा में अध्यापन का कार्य किया। चाहते तो अपना जीवन सरलता व आराम से अपने क्षेत्र में जी सकते थे पर देश की सेना में जा कर देश की सेवा को प्राथमिकता दी। ऐसे शूरवीर को मेरा शत शत नमन। जय हिन्द।




Saturday, 1 September 2018

सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का टैंक जिसमें लड़ते लड़ते वो शहीद हो गए थे

सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, परमवीर चक्र।
रेजिमेंट : 17, पूना हॉर्स
(कृपया पूरा अवश्य पढ़ें)
जुलाई मास में मुझे महाराष्ट्र के अहमदनगर में भारतीय सेना द्वारा निर्मित "टैंक म्यूजियम" में जाने का अवसर मिला, जहां मुझे कई प्रकार के टैंक देखने को मिले, पर मेरी आंखें केवल एक ही टैंक को ढूंढ रही थी, और वो था, सबसे छोटी आयु में परमवीर चक्र से सम्मानित किए जाने वाले शूरवीर, सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का, जिसमें लड़ते लड़ते वो शहीद हो गए थे।
इस असाधारण वीरता का प्रदर्शन कर के वो हमेशा हमेशा के लिए हर भारतीय के दिल में अपनी जगह बना गए। ड्यूटी पर तैनात अधिकारी से जब मैंने उस टैंक के बारे में जानकारी माँगी तो बताया गया कि वो टैंक अरुण खेत्रपाल जी की रेजीमेंट "पूना हॉर्स" के साथ ही रहता है और पूना हॉर्स इसका रख रखाव बहुत ही श्रद्धा से रखती है। ये जानकारी प्राप्त करने के बाद मेरा मन बेताब हो उठा कि काश ! मुझे भी किसी प्रकार से महावीर अरुण खेत्रपाल जी का वो टैंक देखने का सौभाग्य प्राप्त हो।
वो कहते हैं ना, जहां चाह वहां राह। चंद रोज़ बाद ही मुझे पूना हॉर्स के ठिकाने का पता चल गया और मुझे उस टैंक को देखने का न केवल अवसर मिला बल्कि अरुण खेत्रपाल जी के जीवन से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण बातों की जानकारी मिली। ये भी पता चला की आज भी पूना हॉर्स रेजिमेंट कितनी शिद्दत व सम्मान के साथ अपने शहीद साथियों की स्मृतियों को संजो कर रख रहें हैं और कैसे आज के जवानों को उनकी शौर्य गाथाओं से प्रेरित कर रहें हैं। अब आपको मैं उस 21 वर्षीय नौजवान की अमूल्य वीर गाथा से अवगत करवाता हूँ।
एक 21 वर्ष का नौजवान फौज़ी अफ़सर ट्रेनिंग के बाद जिसे सेना में आए हुए अभी 6 महीने भी पूरे नही हुए थे वो युद्ध में शामिल होने निकल पड़ा। 1971 का भारत पाकिस्तान का युद्ध चरम पर था, दिल्ली के रहने वाले इस नौजवान अधिकारी का नाम था अरुण खेत्रपाल ।
बसंतर नदी के नजदीक शकरगढ़ सेक्टर में अपने सेनचुरियन टैंक जिसका नाम था "फामागुस्ता" पर सवार ये नौजवान अधिकारी अपना शौर्य सिद्ध करने के लिए बेताब था। होता भी क्यों नही आखिरकार सेना में जा देश की सेवा करना इन्होंने अपने पुरखों से ही तो सीखा था। इनके पिता ब्रिगेडियर मदन लाल खेत्रपाल सेना के इंजीनियर कोर में कार्यरत थे। अरुण के दादा और पड़दादा भी सेना में सेवारत रह चुके थे। अरुण खेत्रपाल के टैंक का नाम फामागुस्ता क्यों था, इसके पीछे भी एक कहानी है, फामागुस्ता असल में सायप्रस के पूर्वी तट पर बसा एक नगर है जहां 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पूना हॉर्स तैनात थी।
16 दिसंबर 1971 का वो दिन जब पाकिस्तानी सेना को रौंदता हुआ अरुण खेत्रपाल अपने फामागुस्ता टैंक से शत्रु के नाक में दम किए हुआ था। अभी तक इस शूरवीर ने पाकिस्तान के 10 पैटन टैंकों को खत्म कर दिया था। इस दौरान उनके टैंक पर पहला हमला हुआ जिसे वो झेल गए, टैंक को थोड़ा नुकसान भी हुआ, उन्हें वापस आने के लिए कहा गया पर इन्होंने जवाब दिया "अभी मेरी बन्दूक चल रही है, और जब तक ये चल रही है, मैं वापस नही आऊंगा' देशभक्ति का जुनून सर चढ़ कर बोल रहा था। झल्लाये दुश्मन ने थोड़ी ही देर बाद उनके टैंक पर गोला दाग पुनः हमला किया, हमला इतना तीव्र था की, वो गोला टैंक की लगभग 6 इंच मोटी लोहे की परत को काटते हुआ सीधे अरुण को जा लगा और वो वीरगति को प्राप्त हो गए। उन्होंने भारत माता की आन, बान और शान के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान कर दिया।
टैंक के उस क्षतिग्रस्त हिस्से को जब मैंने अपने हाथों में उठा कर देखा तो मेरे रौंगटे खड़े हो गए और मैं सोचने लगा कि इतने मोटे लोहे को भला एक गोला कैसे काट सकता है। पर नियति को यही मंज़ूर था। इसी असाधरण वीरता के प्रदर्शन की वजह से ही इस शूरवीर की जांबाज़ी के किस्से आज भी हर भारतीय के जेहन में ताज़ा हैं।
शहीद अरुण खेत्रपाल के टैंक को देखते ही पहले तो सैलूट किया फिर उस टैंक पर लगी चार तस्वीरों के बारे में जाना वो तीन सैनिक उस समय अरुण खेत्रपाल के साथ टैंक में मौजूद थे। चौथी तस्वीर शहीद अरुण खेत्रपाल की थी। हमले में सबसे पहले रेडियो ऑपरेटर नंद सिंह वीरगति को प्राप्त हुए और फिर अरुण खेत्रपाल। उनके बाकी दो साथी टैंक चालक प्रयाग सिंह और गनर नत्थू सिंह बुरी तरह घायल हो गए पर किसी तरह बच गए।
17 दिसंबर 1971 को जम्मू के समीप सांभा में अरुण खेत्रपाल का अंतिम संस्कार कर दिया। 26 दिसंबर 1971 को जब उनकी अस्थियां उनके परिवार को सौंपी गई, तो उस उसी समय उनके परिवार वालों को उनकी शहादत के बारे में पता चला। 6 फुट 2 इंच लंबे इस नौजवान को सेना ने अपने अदम्य साहस के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया। 26 जनवरी 1972 को तत्कालीन राष्ट्रपति वी वी गिरी ने ये सम्मान शहीद अरुण खेत्रपाल जी की माता जी को प्रदान किया।
एन डी ए, पुणे में परेड ग्राउंड का नाम अरुण खेत्रपाल के नाम पर रखा गया है। यहीं एन डी ए में अरुण ने सेना का प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
मुझे उनके भाई श्री मुकेश खेत्रपाल से मुलाकात का सौभाग्य मिल चुका है। मेरी पुस्तक "देशभक्ति के पावन तीर्थ" का विमोचन उनके हाथों हुआ है। इस विमोचन में कारगिल शहीद वीर चक्र से सम्मानित लेफ्टिनेंट विजयंत थापर के माता पिता कर्नल थापर और श्रीमती तृप्ति थापर भी शामिल हुए थे। उन्होंने बताया की विजयंत, अरुण खेत्रपाल के जीवन से अत्यंत प्रभावित थे और विजयंत अक्सर दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में बने अरुण खेत्रपाल के घर के आगे से निकलते थे और उस अमर शहीद को श्रधांजलि दिया करते थे। कारगिल युद्ध में विजयंत ने देश पर अपनी जान कुर्बान कर कहीं न कहीं अरुण खेत्रपाल के जीवन का सच्चा अनुसरण ही किया।
बॉलीवुड ने शहीद अरुण खेत्रपाल के जीवन पर फ़िल्म बनाने का निर्णय लिया है जो वाक़ई स्वागत योग्य है। अमर शहीद अरुण खेत्रपाल को शत शत नमन। मेरा आप सभी से अनुरोध है की इस पोस्ट को अपने मित्रों व रिश्तेदारों के साथ अवश्य सांझा करें।
जय हिन्द।












Sunday, 5 August 2018

लन्दन में क्रांतिकारियों के तीर्थ "इंडिया हाउस" पर नमन

प्रिय मित्रों
सादर नमस्कार


चंद दिनों बाद हमारे साथ साथ पूरा देश आज़ादी की 72वीं वर्षगांठ मना रहा होगा, अगस्त का महीना चढ़ते ही आजादी के पर्व को धूम धाम से मनाने की तैयारियाँ ज़ोर पकड़ने लगती हैं. आज मैं आपको एक ऐसे स्थान की जानकारी दे रहा हूँ जिसका देश को आज़ाद करवाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है.

आज मैं आपको उत्तरी लन्दन के हाईगेट इलाके में स्थित 65 “क्रोमवेल एवेन्यू” पर ले कर चल रहा हूँ, जिसे हम भारत वासी इंडिया हाउस के नाम से जानते हैं. इंडिया हाउस लन्दन में भारतीय क्रांतिकारियों का मुख्य केंद्र था जहाँ देश को आजादी दिलवाने के लिए नित नई योजनाएं बनती. श्याम जी कृष्ण वर्मा के बारे में तो आप सभी जानते ही हैं, वर्ष 1897 में श्याम जी कृष्ण वर्मा लन्दन आ गए और अपनी कमाई दौलत से यहाँ हाईगेट क्षेत्र में एक मकान खरीद लिया.
वर्ष 1905 में श्याम जी कृष्ण वर्मा ने 65, “क्रोमवेल एवेन्यू” को ख़रीद लिया और इसका नाम “इंडिया हाउस” रख दिया, जिसका अधिकारिक रूप से 10 जुलाई 1905 को उद्घाटन किया गया. उद्घाटन के समय देश के जाने माने स्वतंत्रता सेनानी दादा भाई नौरोजी, लाला लाजपत राय, लाला हंसराज इत्यादि शामिल हुए. इंडिया हाउस के दरवाजे भारत से आने वाले हर भारतीय के लिए खुले होते थे. यहाँ देशभक्तों की नियमित रूप से बैठकें होती थीं, जिसमे देश को शीघ्र अति शीघ्र आज़ाद करवाने के लिए यथा संभव प्रयास होते थे.

 1906 में वीर सावरकर और मदन लाल ढींगरा भी लन्दन पहुँच गए और इंडिया हाउस के संपर्क में आ गए. मैडम भिकाजी कामा भी इंडिया हाउस नियमित रूप से आती जाती रहती थीं. हर इतवार को यहाँ विशेष कार्यक्रम का आयोजन होता था जिसमें सभी देशभक्त क्रन्तिकारी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे. इस इतिहासिक धरोहर के दर्शन करना मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ.
वर्ष 2016 में मुझे कच्छ (गुजरात) के मांडवी जाने का भी मौका मिला जहाँ श्याम जी कृष्ण वर्मा का जन्म हुआ था. आज उस स्थान को क्रांति तीर्थ के नाम से जानते हैं. तब मैंने वहां इंडिया हाउस के अनुकृति देखी थी. मुख्य भवन को इंडिया हाउस जैसा ही बनाया गया है. उस समय मेरे मन में बरबस ही ये इच्छा जागृत हुई की काश मुझे भी एक दिन लन्दन में बने इंडिया हाउस को देखने का सौभाग्य मिले, और फिर जून 2018 में इश्वर ने मुझे ये मौका दे ही दिया.

आशा है आप सब भी अपनी कॉलोनी में 15 अगस्त को तिरंगा फेहराने व् देश से जुड़े कुछ कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहे होंगे अगर नहीं बना रहे तो अवश्य बनायें और बच्चों को इस कार्यक्रम में अवश्य शामिल करें.


जय हिन्द. जय भारत.    





इंडिया हाउस, लन्दन 


इंडिया हाउस का नजदीकी मेट्रो "हाईगेट"

मांडवी, कच्छ गुजरात में बना क्रांति तीर्थ

लेखक क्रांति तीर्थ पर